Sunday, 10 July 2011

सूबे में दमकेगी फूलो की चहक

 गुमला जिले के सुदूर गांव हापामोनी की फूलो देवी बेहद खुश है। उसका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। कई अन्य महिलाओं के लिए अब फूलो माडल बन चुकी है, ग्रामीण महिलाएं दीदी से सफलता का राज पूछते अघाती नहीं। गुमला के सुदूर गांव हापामनी में स्ट्राबेरी की खेती, कभी सोचा है आपने, हां यह कर दिखाया है फूलो ने, स्ट्राबेरी ही नहीं, मशरुम, जड़ी-बुटी भी उपजाती है फूलो। अब तो उसे अपने उत्पाद बेचने के लिए रांची भी नहीं आना पड़ता। गांव में ही उसकी स्ट्राबेरी पांच रुपये पीस खरीदने शहर के व्यवसायी पहुंच रहे हैं। ऐसे ही कहानी है महादेव भगत की, अपनी खेत में जड़ी-बूटी उपजाते हैं। वैद्य भी हैं, कुछ जड़ी का इस्तेमाल खुद करते हैं, शेष गांव में ही बिक जाता है।
यह सब कुछ यों ही नहीं हुआ इसके पीछे विकास भारती विशुनपुर और कृषि विज्ञान केंद्र गुमला की महत्वपूर्ण भूमिका है। विकास भारती के सचिव अशोक भगत कहते हैं कि जब से (1983 से)हम इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं तब से हमने समेकित कृषि विकास पर जोर दिया। केवीके की मदद से टिकाऊ कृषि तकनीक की महज शिक्षा ही नहीं दी, किसानों के द्वारा खेत में तैयार विभिन्न फसलों के माडल भी ग्रामीणों को दिखाया। अब वे सामने आने लगे हैं, और समेकित खेती का महत्व समझने लगे हैं। इसके तहत राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत जहां परती जमीन में फलदार वृक्ष लगाए जा रहे हैं, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जलों
का टिकाऊ प्रबंधन किया जा रहा है, पेड़ों के बीच की जमीन में रबी व खरीफ फसल लगाए जा रहे हैं। साथ ही पशुपालन और चारा उत्पादन जैसे प्रयास भी चल रहे हैं। इसके साथ ही उत्पाद को बाजार से जोडऩे के लिए कई एजेंसियों को आमंत्रित किया गया है जो किसानों के उत्पाद गांव में खरीद लेते हैं। विकास भारती विशुनपुर की ओर से क्षेत्र के सैकड़ोंं ग्रामीणों को विभिन्न कलाओं व प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अशोक भगत व केबीके के वैज्ञानिक डा. संजय सिंह कहते हैं कि राज्य में जड़ी-बुटी के उत्पादन का उपुयक्त वातावरण है। इसे अभियान के रूप में चला सूबे को ग्रामीणों को नई आर्थिक आजादी दी जा सकती है।
March 10, 2011

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